वंचितों को शिक्षा के दायरे से बाहर करने का सरकार का षड़यंत्र

शाला में पंजीकृत बच्चों एवं नियमित उपस्थिति में भी भारी अंतर है। वर्तमान शिक्षा प्रणाली समाज में एक गहरी खाई बनाने का कार्य कर रही है। पूरे भारत वर्ष में अभी भी 60 लाख से भी ज्यादा बच्चे स्कूल से बाहर…

वंचितों को शिक्षा के दायरे से बाहर करने का सरकार का षड़यंत्र

अहमदाबाद, 06 मार्च। गुजरात में शिक्षा के ताजा हालात, बजटीय आवंटन, सार्वजनिक शिक्षा व्यवस्था के बारे में कुछ रोचक और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के लिहाज से बेहद निराशाजनक तथ्य सामने आ रहे हैं। आप चाहें जिस भी राज्य में चले जाएँए आम तौर पर यही महसूस होता है कि आम जनों और बहुसंख्यक तबकों के बच्चों की शिक्षा सरकार की प्राथमिकता में है ही नहीं। आरटीई एक्ट के क्रियान्वयन की हालत बेहद खराब है। अभी एमएचआरडी ने मिड डे मील्स के लिए भी आधार कार्ड को जरूरी बनाने का सर्कुलर निकाल दिया है। शिक्षा के जरिये वंचितों को शिक्षा के दायरे में लाने की जगह सरकार उन्हें शिक्षा से दूर करने और हाशिये पर फेंकने का काम करने में लगी हैं और शिक्षा को निजी स्कूलों, प्राइवेट कंपनियों एवं कॉर्पोरेट घरानों के हवाले करने की कवायद में लगी हैं।

यह तथ्य गुजरात आरटीई फोरम, शाला मित्र संघ गुजरात एवं राष्ट्रीय स्तर पर कार्यरत राइट टू एजुकेशन फोरम द्वारा शिक्षा के अधिकार कानून के क्रियान्वयन में शाला व्यवस्थापन समिति, फेडरेशन एवं शिक्षकों की भूमिका पर अहमदाबाद में आयोजित एक दिवसीय राज्य स्तरीय कन्वेंशन में सामने आए।

शिक्षा अधिकार कानून के क्रियान्वयन की स्थिति पर आयोजित इस राज्य स्तरीय कन्वेंशन में शाला व्यवस्थापन समिति के सदस्यों, शिक्षकों, शिक्षक संगठनों, और शिक्षा के क्षेत्र में कार्यरत विभिन्न सामाजिक कार्यकर्ताओं के साथ.साथ वकीलों, पत्रकारों एवं पार्षदों ने भी हिस्सा लिया।

सीईई अहमदाबाद में आयोजित इस एक दिवसीय कार्यशाला में शिक्षा अधिकार कानून के लागू होने के तकरीबन साढ़े छह वर्ष पूर्ण होने पर भी राज्य में शिक्षा एवं स्कूलों की वर्तमान स्थिति पर चर्चा की गई।

कार्यक्रम की शुरूआत में शाला मित्र संघ के कन्वेनर मुजाहिद नफ़ीस ने अपने स्वागत उद्बोधन में शिक्षा अधिकार कानून के क्रियान्वयन में राज्य की परिस्थितियों में प्रकाश डालते हुये कहा कि प्रदेश व जिले में शिक्षा की गुणात्मकता में वृद्धि करने के लिए समस्त नागरिकों को जिम्मेवारी लेनी होगी। शाला व्यस्थापन समिति से लेकर शासकीय विभाग, शिक्षक संघों एवं टोला सेवकों में सक्रियता लानी होगी। आकड़ों के मुताबिक निजी स्कूलों में 25 फीसदी आर्थिक रूप से कमजोर एवं वंचित तबकों के बच्चों का नामांकन किया जाना था, लेकिन स्थिति अत्यंत दयनीय है। शिक्षा से संबंधित रिपोर्टों ने भी स्थिति पर अनेक सवाल किये हैं, जिसका जवाब सामूहिक रूप से खोजना होगा।

राष्ट्रीय शिक्षा अधिकार फोरम के प्रतिनिधि मित्ररंजन ने राष्ट्रीय परिदृश्य में अपनी बात रखते हुये कहा कि कानून के साढ़े छह वर्ष पूरे होने पर भी पूरे भारत वर्ष में अभी भी 60 लाख से भी ज्यादा बच्चे स्कूल से बाहर हैं। आज भी केवल 10 प्रतिशत स्कूल ही आर.टी.ई. के मापदण्डों को पूर्ण कर पाये हैं। 2011 की जनगणना के मुताबिक आउट ऑफ स्कूल बच्चों की संख्या आठ करोड़ से भी अधिक आंकी गई है, जो बेहद चिंता की बात है। केन्द्रीय स्तर पर शिक्षा के क्षेत्र में लगातार की जा रही बजट कटौती ने इस कानून के क्रियान्वयन की संभावना को और भी कमजोर कर दिया है।

उन्होंने ध्यान दिलाया कि शिक्षा अधिकार कानून पर अमल की परिस्थितियों पर चर्चा के दौरान यह तथ्य सामने आया कि शाला में पंजीकृत बच्चों एवं नियमित उपस्थिति में भी भारी अंतर है। वर्तमान शिक्षा प्रणाली समाज में एक गहरी खाई बनाने का कार्य कर रही है। एक तरफ प्राइवेट स्कूलों का जाल है तो एक तरफ शासकीय स्कूल कमजोर होते जा रही है, जबकि देश के 90 प्रतिशत बच्चे शासकीय स्कूलों में पढ़ते हैं और जन कल्याणकारी राष्ट्र होने के नाते शासन की जिम्मेदारी है कि अपने विद्यार्थियेां को गुणात्मक शिक्षा उपलब्ध कराये।

महेश पंड्या ने कहा कि शिक्षा एक सामाजिक मुद्दा है इसिलिये शिक्षा पर समाज में बहस होना चाहिये विशेषकर ग्राम सभा में शिक्षा के स्थिति पर चर्चा होना अति आवश्यक है और लोगों को शिक्षा के मौलिक अधिकार को हासिल करने के लिए एकजुट होकर पहल करने की जरूरत है।

डॉ झरना बेन पाठक ने शिक्षा के अधिकार अधिनियम के नियमों का हवाला देते हुए कहा कि हम सब की ज़िम्मेदारी है कि सब मिलकर इस मूलभूत अधिकार के अमलीकरण पूर्ण रूप से हो के लिए साझा प्रयास करें। लेकिन इसके लिए संस्थाओं एवं जनप्रतिनिधियों के साथ-साथ एसएमसी सदस्यों एवं शिक्षकों का सहयोग भी आवश्यक है।

आल इंडिया आइडियल टीचर्स एसोसिएशन के अब्दुल अज़ीज़ ने एसएमसी फेडरेशन के गठन की बात पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि प्राथमिक शिक्षा स्तर में तभी सुधार आ पाएगा जब हम सिर्फ आंकडों के खेल में न पडकर जमीनी स्तर पर शिक्षा को मजबूत करने के नवीन तौर-तरीके ढूंढेंगे। इसमें माता-पिता, समुदाय से लेकर शिक्षकों की काफी महत्वपूर्ण भूमिका है।

अब्दुल हकीम ने कहा कि शिक्षा में वास्तविक सुधार के लिए हमें लोगों के बीच ज्यादा-से-ज्यादा बैठकों और समुदाय के साथ संवाद की जरूरत है।

कार्यशाला के दौरान ज्योत्सना बेन ने शिक्षा की वर्तमान स्थिति और उसमें लडकियों व समुदाय की दशा को वर्णित करते हुए अपनी SMC के काम को रखा।

चर्चा के दौरान यह बात भी आई कि समावेशी शिक्षा के माध्यम से निःशक्त जनों को फायदा हुआ तो है लेकिन आज भी विशेष शिक्षक की भारी कमी है तथा समाज भी इनके निःशक्त वर्गो के शिक्षा के प्रति संवेदनशील नहीं हैं। जब तक निःशक्त बच्चों के शिक्षा के अनुकूल वातावरण पैदा नही होगा तब तक निःशक्त बच्चे की शिक्षा की स्थिति पर गुणात्मक विकास नहीं हो पायेगा।

समुदाय के साथियों द्वारा शाला मित्र संघ की वेबसाइट http://www.shalamitra.com को भी जनता को समर्पित किया।

कार्यक्रम में अहमदाबाद घोषणापत्र भी सभी के द्वारा सर्वसम्मति से पास किया जिसमें शिक्षा के मूलभूत अधिकार के अमलीकरण की मुख्य बिंदु है।

कार्यक्रम के दौरान कई एसएमसी सदस्यों, कॉर्पोरटर, सामाजिक कार्यकार्ताओं एवं शिक्षकों ने भी स्कूल संबंधी समस्याओं एवं चुनौतियों के बारे में साझा किया। कार्यक्रम में कुल 90 लोगों ने भागीदारी की।

अंकित सिंह, कनुप्रिया बेन, अमृत भाई, संजीदा बेन के अलावा कई एसएमसी सदस्य और शिक्षकगण मौजूद थे। कार्यक्रम के अंत में धन्यवाद ज्ञापन संतोष प्रधान ने किया।

http://www.hastakshep.com/news-in-hindi/rte-convention-ahamadabad-13435

 

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